अंतर
समाज अब बहुत आगे बढ़ चुका है,बहुत सारी कुरीतियों से मुक्त हो चुका है। बहुत सारे विभेदों को पाट चुका है,नही पाट पाया तो एक स्त्री और पुरुष का अंतर। प्राकृतिक रूप से देखें तो यह विभेद ही इन दोनों स्वरूपों का अस्तित्व है,लेकिन समाज बंटता रहा कभी मातृसत्तात्मक तो पितृसत्तात्मक पक्षों में। सूरज की पत्नी दर्द से कराह रही थी, 9 महीने के इंतज़ार के बाद आज फैसला......, बाहर सबके चेहरे एक दूसरे को देखते हुए एक डर छुपाये लड़का या ..... दुनिया चाँद पर पहुंच जाए पर यह समय न बदल सकता। इसी उहापोह के बीच एक मीठी सी किलकारी की आवाज़ आयी, यह आश्वस्त तो हो गए सब बच्चा ठीक है, अब बस दरवाजा खुले और खबर मिल जाये कि.... आखिरकार आशा आयी और बताया लक्ष्मी आयी हैं, मैं कहती हूँ लक्ष्मी ही क्यों हर बार ... काली सरस्वती और दुर्गा भी तो हो सकती हैं। सूरज का चेहरा जैसे स्वीकार लिया मैने यह जिम्मा भी जल्द ही दूसरा प्रयास .....कुलदीपक के लिए, परिवार के सदस्यों की सहानुभूति भरी नज़र सूरज रेस में हारे हो पर अगली बार सफल होना।फिर लक्ष्मी का पीठ पूजा जाएगा भी ले आएगी ।। पूजिये लड़कियों को बस सुरक्षि...