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शिक्षक

मध्यांतर की घण्टी और सभी शिक्षकों का जुटाव  शिक्षक आराम कक्ष में,सबने अपने अपने टिफिन को खोला और खाने के साथ साथ परिचय शुरू हुआ,कौन कहाँ से है,किसने कितनी बार मे परीक्षा पास की,शब्दों के समूह से बनते वाक्य और हवा के सहारे लहराता मेरे कानों तक पहुंचा, अरे मैं तो आईएएस की तैयारी में संलग्न था,साथ साथ बीएड कर लिया मौका लगते परीक्षा दी और उतीर्ण कर यहां जॉइन किया,रोजी रोटी के लिए कुछ तो आय चाहिए, बस गाँव ही चाहिए था,मुझे जहां काम का बोझ न हो ज्यादा और मैं अपनी तैयारी जारी रख सकूँ।तभी दूसरे अध्यापक बीच मे ही बोले,मैं भी मेडिकल की न जाने कितने प्रयास किये सफल न हो पा रहा था साथ साथ बीएड भी कर लिया और आज यहॉं हूँ, पूरे मध्यांतर शब्दों के कई समूह कानों तक आते गए न जाने कितनी मजबूरियों ने पूरे विद्यालय को नए स्टाफ दे दिए।

खुशी

रेलगाड़ी अपनी रफ्तार से चल रही थी,सोनू और रानू दुबके से एक बर्थ पर डरे सहमे बैठे थे।न भूख न प्यास बस गुजरते जा रहे पेड़ घास गाय, बकरी एकटक देखे जा रहे थे और नज़र गड़ी थी किसके पास फ़ोन है कौन आसानी से दे देगा थोड़ी देर देख सुन कर सोनू ने बगल में बैठे अंकल से फ़ोन मांगा अंकल बस एक मिस्डकॉल कर सकते हैं क्या ? अंकल ने कहा हां हां बेटा कॉल ही कर लो,बड़े भाई को फ़ोन लगा सोनू से पूछा क्या स्थिति है भैया, भैया का जवाब आया माँ आपरेशन थिएटर के चली गयी है,दो घंटे लगेंगे अभी । फ़ोन अंकल को देकर सोनू रानू वापस उसी मौन स्थिति में एकटक बाहर की ओर देखते बैठे रहे बस एक पानी का बोतल था उनके पास रात 8 बजे गाड़ी लखनऊ स्टेशन पहुंची । दोनों चुपचाप स्टेशन पर उतरे और सामने की कुर्सी पर बैठ गए। थोड़ी देर बाद उनके बड़े भैया उनको लेके हॉस्पिटल गए,माँ से एक एक कर मिलना था वह आई सी यू में थी। सबसे पहले सोनू गया वह यथावत एकदम मौन बाहर आया। फिर रानू की बारी आयी आई सी यू से लौटते वक्त उसकी आंखें भरी हुई छलक आयी । बाहर आकर बड़े भैया से कहा माँ का सारा बाल हटा दिया स्टेशन पर भी तो एक बार बताते कम से कम ।  देर रात सोनू रानू जागे...

सच्चा प्रेम

मन ही मन बड़बड़ा रही थी सरिता,  यह कौन सा प्रेम है । सुरेश की यही आदत मुझे अच्छी न लगती है, सांच को आंच क्या ! अगर मैं सही हूँ उनकी नज़र में तो वो सबके सामने स्वीकार कर सकते हैं ,और गलत हूँ तब भी । पता नही क्यों झूठ से मन झुंझला उठता है ।कमरे में मेरे सामने कहना कि तुम अच्छी हो,और बाकी परवार में किसी के आक्षेप का कोई उत्तर न देना अक्सर विडंबना में डाल देता है कि मेरे और सुरेश के बीच प्रेम और विश्वास है भी की नही । मन ही मन सोचती बड़बड़ाती सरिता अपना काम समेटती  रही।दिन गुजरते रहे ,इस बात की टोह के लिए उसने कोई प्रयास न किया । घर गृहस्थी ऐसी ही होती है शायद औरतें मन ही मन ...... हॉल में शोर सुनकर दरवाजे तक आयी सरिता,अचानक ससुर जी की आवाज़ मैं आजतक सरिता की गलतियां देखता आ रहा पूरे परिवार में उसकी वजह से ही कलह है,सरिता के पैरों तले मानो जमीन नही ... काठ की तरह खड़ी रही दरवाजे से लगकर ,की अचानक सुरेश की तेज आवाज ने तंद्रा तोड़ी,सुरेश कह रहा था ठीक है पिताजी,सरिता इतनी ही गलत है तो मैं और सरिता घर छोड़कर चले जाते हैं । उसके बाद पिताजी बौखला कर बाहर निकल गए,सरिता चुपचाप अपना काम करती रही ,...

बचपना

माँ मैं नही जानती कुछ ।  आप बस पूजा को नही पढ़ाएंगी।  विद्यालय में पढ़ती हैं,ठीक है लेकिन अब घर पर भी ! मुझे अच्छा नही लगता है,पूजा हर चीज़ मेरे जैसी ले लेती है  फ्रॉक, हेयर बैंड,यहां तक कि कॉपी और कलम भी । और अब वो आपसे ट्यूशन्स भी पढ़ेगी !  बताइए जरा फिर उसमें और मुझमे कोई अंतर रह जायेगा क्या ? माँ - बेटी तू तो जानती हैं न! पापा के बाद घर के खर्चे तेरी पढ़ाई सिर्फ स्कूल के तनख्वाह से चला पाना मुश्किल है ,ट्यूशन्स तो लेने पड़ेंगे,और जितने बच्चे आएंगे पैसे भी ज्यादा होंगे । ठीक है माँ मैं अपनी कुछ जरूरते कम कर लूँगी लेकिन आप पूजा को नही पढ़ाएंगी । माँ- बेटा एक बात बता मुझे तुझे पता है तुझमे और पूजा में क्या फर्क है  राधा - नही,मुझे नही जानना ,माँ बस आप बताइए आप मेरी बात मानेंगी या नही । माँ - बेटा, सुन तो ! तू मेरी बेटी है ! और पूजा मेरी छात्रा । राधा - ठीक है माँ ,आप पढ़ाइये, मैं और ज्यादा मेहनत करूँगी और कक्षा में सदा अव्वल आऊंगी और आपका नाम ऊंचा रखूँगी ।।

अंतर

समाज अब बहुत आगे बढ़ चुका है,बहुत सारी कुरीतियों से मुक्त हो चुका है। बहुत सारे विभेदों को पाट चुका है,नही पाट पाया तो एक स्त्री और पुरुष का अंतर। प्राकृतिक रूप से देखें तो यह विभेद ही इन दोनों स्वरूपों का अस्तित्व है,लेकिन समाज बंटता रहा  कभी मातृसत्तात्मक तो पितृसत्तात्मक पक्षों में।  सूरज की पत्नी दर्द से कराह रही थी, 9 महीने के इंतज़ार के बाद आज फैसला......, बाहर सबके चेहरे एक दूसरे को देखते हुए एक डर छुपाये  लड़का या ..... दुनिया चाँद पर पहुंच जाए पर यह समय न बदल सकता। इसी उहापोह के बीच एक मीठी सी किलकारी की आवाज़ आयी, यह आश्वस्त तो हो गए सब बच्चा ठीक है, अब बस दरवाजा खुले और खबर मिल जाये कि.... आखिरकार आशा आयी  और बताया लक्ष्मी आयी हैं, मैं कहती हूँ लक्ष्मी ही क्यों हर बार ... काली सरस्वती और दुर्गा भी तो हो सकती हैं। सूरज का चेहरा जैसे  स्वीकार लिया मैने यह जिम्मा भी जल्द ही दूसरा प्रयास .....कुलदीपक के लिए, परिवार के सदस्यों की सहानुभूति भरी नज़र सूरज रेस में हारे हो पर अगली बार सफल होना।फिर लक्ष्मी का पीठ पूजा जाएगा भी ले आएगी ।। पूजिये लड़कियों को बस सुरक्षि...

क्रोध ( विधा : लघुकथा)

सुबह के 9 बज रहे थे और घर बासी , न झाड़ू लगा था ,और न पोंछा। रसोई में भी बर्तन के अम्बार लगे थे।कुसुम मन ही मन खीझ रही थी और काम करने वाली बाई की राह देख रही थी मानो आज वो आयी तो ....।   आधा घंटा और बिता फिर उसके मन में कितने सवाल उठे क्या मैं इतनी मजबूर हूँ इतने बर्तन न धुल पाऊँगी , क्यों मैं पूर्णतः आश्रित हो गयी हूँ बाई पर, इससे पहले ,सब कुछ तो किया है मैने फिर आज क्यों हाथ बांधे इंतजार कर रही हूँ.. आदि आदि। और न जाने कितने ख़्याल और इसी उधेड़बुन में बच्चे को बिस्तर पर छोड़ कुसुम रसोई में दौड़ी। धड़ाधड़ सारे बरतन धो डाले। अब झाड़ू लेकर कमरों की सफाई में लग गयी,अभी एक कमरा ही हुआ था कि10 बजे काम वाली बाई आ गयी । कुसुम ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिया। चुपचाप अपना काम करती रही । बाई को तो काटो तो खून नहीं । और घरों में तो देर हो जाये तो डाँट की पूरी डोज़ मिलती है यहाँ तो दृश्य ही अलग था । कान पकड़ कर उसने माफी मांगी । "दीदी मैं कर रही हूँ, कल से देरी नही होगी...।" कुसुम का मुन्ना भाई का आइडिया गाँधीगिरी अपनाना पूर्णतया सफल रहा। (लेकिन कुसुम चुपचाप काम करती रही और बाई एकटक देखती रही ।) सुप...