सच्चा प्रेम
मन ही मन बड़बड़ा रही थी सरिता, यह कौन सा प्रेम है । सुरेश की यही आदत मुझे अच्छी न लगती है, सांच को आंच क्या ! अगर मैं सही हूँ उनकी नज़र में तो वो सबके सामने स्वीकार कर सकते हैं ,और गलत हूँ तब भी । पता नही क्यों झूठ से मन झुंझला उठता है ।कमरे में मेरे सामने कहना कि तुम अच्छी हो,और बाकी परवार में किसी के आक्षेप का कोई उत्तर न देना अक्सर विडंबना में डाल देता है कि मेरे और सुरेश के बीच प्रेम और विश्वास है भी की नही । मन ही मन सोचती बड़बड़ाती सरिता अपना काम समेटती रही।दिन गुजरते रहे ,इस बात की टोह के लिए उसने कोई प्रयास न किया । घर गृहस्थी ऐसी ही होती है शायद औरतें मन ही मन ...... हॉल में शोर सुनकर दरवाजे तक आयी सरिता,अचानक ससुर जी की आवाज़ मैं आजतक सरिता की गलतियां देखता आ रहा पूरे परिवार में उसकी वजह से ही कलह है,सरिता के पैरों तले मानो जमीन नही ... काठ की तरह खड़ी रही दरवाजे से लगकर ,की अचानक सुरेश की तेज आवाज ने तंद्रा तोड़ी,सुरेश कह रहा था ठीक है पिताजी,सरिता इतनी ही गलत है तो मैं और सरिता घर छोड़कर चले जाते हैं । उसके बाद पिताजी बौखला कर बाहर निकल गए,सरिता चुपचाप अपना काम करती रही ,...