क्रोध ( विधा : लघुकथा)
सुबह के 9 बज रहे थे और घर बासी , न झाड़ू लगा था ,और न पोंछा। रसोई में भी बर्तन के अम्बार लगे थे।कुसुम मन ही मन खीझ रही थी और काम करने वाली बाई की राह देख रही थी मानो आज वो आयी तो ....।
आधा घंटा और बिता फिर उसके मन में कितने सवाल उठे क्या मैं इतनी मजबूर हूँ इतने बर्तन न धुल पाऊँगी , क्यों मैं पूर्णतः आश्रित हो गयी हूँ बाई पर, इससे पहले ,सब कुछ तो किया है मैने फिर आज क्यों हाथ बांधे इंतजार कर रही हूँ.. आदि आदि।
और न जाने कितने ख़्याल और इसी उधेड़बुन में बच्चे को बिस्तर पर छोड़ कुसुम रसोई में दौड़ी। धड़ाधड़ सारे बरतन धो डाले। अब झाड़ू लेकर कमरों की सफाई में लग गयी,अभी एक कमरा ही हुआ था कि10 बजे काम वाली बाई आ गयी । कुसुम ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिया। चुपचाप अपना काम करती रही । बाई को तो काटो तो खून नहीं । और घरों में तो देर हो जाये तो डाँट की पूरी डोज़ मिलती है यहाँ तो दृश्य ही अलग था । कान पकड़ कर उसने माफी मांगी ।
"दीदी मैं कर रही हूँ, कल से देरी नही होगी...।"
कुसुम का मुन्ना भाई का आइडिया गाँधीगिरी अपनाना पूर्णतया सफल रहा।
(लेकिन कुसुम चुपचाप काम करती रही और बाई एकटक देखती रही ।)
सुप्रिया पाठक "रानू"
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