खुशी

रेलगाड़ी अपनी रफ्तार से चल रही थी,सोनू और रानू दुबके से एक बर्थ पर डरे सहमे बैठे थे।न भूख न प्यास बस गुजरते जा रहे पेड़ घास गाय, बकरी एकटक देखे जा रहे थे और नज़र गड़ी थी किसके पास फ़ोन है कौन आसानी से दे देगा थोड़ी देर देख सुन कर सोनू ने बगल में बैठे अंकल से फ़ोन मांगा अंकल बस एक मिस्डकॉल कर सकते हैं क्या ? अंकल ने कहा हां हां बेटा कॉल ही कर लो,बड़े भाई को फ़ोन लगा सोनू से पूछा क्या स्थिति है भैया, भैया का जवाब आया माँ आपरेशन थिएटर के चली गयी है,दो घंटे लगेंगे अभी । फ़ोन अंकल को देकर सोनू रानू वापस उसी मौन स्थिति में एकटक बाहर की ओर देखते बैठे रहे बस एक पानी का बोतल था उनके पास रात 8 बजे गाड़ी लखनऊ स्टेशन पहुंची । दोनों चुपचाप स्टेशन पर उतरे और सामने की कुर्सी पर बैठ गए। थोड़ी देर बाद उनके बड़े भैया उनको लेके हॉस्पिटल गए,माँ से एक एक कर मिलना था वह आई सी यू में थी। सबसे पहले सोनू गया वह यथावत एकदम मौन बाहर आया। फिर रानू की बारी आयी आई सी यू से लौटते वक्त उसकी आंखें भरी हुई छलक आयी । बाहर आकर बड़े भैया से कहा माँ का सारा बाल हटा दिया स्टेशन पर भी तो एक बार बताते कम से कम । 
देर रात सोनू रानू जागे रहे रानू सोनू से 
रानू - जानते हो तीसरी में थी मैं तब माँ के बाल पूरे मेरे हाथ मे पकड़ में आ जाते थे तबसे दसवीं तक रोज उनकी चोटी मैंने ही बांधी है,और आज .....
सोनू - दीदी बाल तो फिर आ जाएंगे माँ के माँ ज़िंदा है न यही बहुत बड़ी ..... है हमारे लिए ।।

Comments

Manisha Goswami said…
बहुत ही मार्मिक वा हृदयस्पर्शी लघुकथा
हृदय से आभार आदरणीया

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